कंधे झुके जाते हैं...
अनदिखे बोझ से
कदम पहाड़ बन जाते हैं
चलने के नाम से
रिश्तों की भारी गठरी है,
मंजिल है पर राह नही
उग आते हैं राह में शब्दों के काँटे,
शब्द गूँजते हैं पर ,आवाज है नही.....
हो जाती हैं नदियाँ भी खारी,
घूँट भर प्यास देखकर,
सुलगती है हरियाली भी
चाँदनी रात देखकर....
-संगीता
अनदिखे बोझ से
कदम पहाड़ बन जाते हैं
चलने के नाम से
रिश्तों की भारी गठरी है,
मंजिल है पर राह नही
उग आते हैं राह में शब्दों के काँटे,
शब्द गूँजते हैं पर ,आवाज है नही.....
हो जाती हैं नदियाँ भी खारी,
घूँट भर प्यास देखकर,
सुलगती है हरियाली भी
चाँदनी रात देखकर....
-संगीता
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