आज फिर देखा
किसी को टूटते हुए
पत्तियों को शाख से छूटते हुए
वो डोर जो दिखती नही थी
खुली आँखों से ,
आज गाँठे महसूस ली
बंद आँखों ने,
फिर सागर में आँखों से मोती गिरी ....
-संगीता
पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...
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