Thursday, 17 January 2019

कदम थकते नही...

उसूलों की पथरीली राह पर
जिद के उभरे काँटे
जिस्म को चुभती  सी आवाज
और,विरोधों की मिलती पगडण्डियों ने
चलना मुश्किल किया ...
फिर भी, कदम हैं कि थकते नहीं
निःस्वार्थ की ओढ़ कर चादर
खारे जल में कमल उगाते
सम्वेदनाओं की सीढ़ियों से
गहरे उतरते...
गिरते हैं, सम्भलते हैं,
फिर भी,कदम हैं कि थकते नहीं..
                            -डॉ०संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...