आजकल खामोशियों के पर निकल आये हैं,
मनभावन सी डाल बैठने की चाह है।
सीधे -साधे से दो लफ्ज़ की बातें,
बातों ही बातों में कहने की चाह है।
मन की अमराई में कोयल की कूकें,
मन ही मन कोई सुन ले ,ये चाह है।
पैर पसारती जड़ता को चेतन जो कर दे,
ऐसे अनुरागी को छूने की चाह है।
- Sangita
मनभावन सी डाल बैठने की चाह है।
सीधे -साधे से दो लफ्ज़ की बातें,
बातों ही बातों में कहने की चाह है।
मन की अमराई में कोयल की कूकें,
मन ही मन कोई सुन ले ,ये चाह है।
पैर पसारती जड़ता को चेतन जो कर दे,
ऐसे अनुरागी को छूने की चाह है।
- Sangita
No comments:
Post a Comment