आज मिल गया था कुछ
दबा-दबा सा किताब से
छूकर देखा तो
वो एक लम्हा था।
वही लम्हा आज फिर
जीने को दिल करता है,
बरसों पहले सा
दिल जोर से धड़कता है।
उम्र का फासला
तय कर लूँ दिल करता है।
आज फिर अंतर का
सागर उमड़ता है।
आज फिर....
-संगीता
दबा-दबा सा किताब से
छूकर देखा तो
वो एक लम्हा था।
वही लम्हा आज फिर
जीने को दिल करता है,
बरसों पहले सा
दिल जोर से धड़कता है।
उम्र का फासला
तय कर लूँ दिल करता है।
आज फिर अंतर का
सागर उमड़ता है।
आज फिर....
-संगीता
No comments:
Post a Comment