Saturday, 28 March 2020

फिर से....

आज मिल गया था कुछ
दबा-दबा सा किताब से
छूकर  देखा तो
 वो एक लम्हा था।
वही लम्हा आज फिर
जीने को दिल करता है,
बरसों पहले सा
दिल जोर से धड़कता है।
उम्र का फासला
तय कर लूँ दिल करता है।
आज फिर अंतर का
सागर उमड़ता है।
आज फिर....
              -संगीता
                

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...