चलते-चलते बड़ी दूर तक चले आए
जाने क्या पाने की चाह,दिल में छुपाए
सब कुछ पाकर भी ,कुछ पाने की चाह
रुकने न देगा मन को ,कदम चलते रहेंगे राह
कहीं रुक कर ,देखा पीछे ,किसी मोड़ पर मुड़कर
क्या -क्या पाया मैंने, क्या चली आई खोकर
अब लौटना न होगा कभी उस गली, उस डगर
बढ़ते कदम, पीछे की राह, रहने नही देते क्षण भर....
डॉ०संगीता
लखनऊ
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