Saturday, 6 June 2020

मोड़ पर पहुँच कर....

चलते-चलते बड़ी दूर तक चले आए
जाने क्या पाने की चाह,दिल में छुपाए 
सब कुछ पाकर भी ,कुछ पाने की चाह
रुकने न देगा मन को ,कदम चलते रहेंगे राह
 कहीं रुक कर ,देखा पीछे ,किसी मोड़ पर  मुड़कर
क्या -क्या पाया मैंने, क्या चली आई खोकर
अब लौटना न होगा कभी उस गली, उस डगर
बढ़ते कदम, पीछे की राह, रहने नही देते क्षण भर....
                                      डॉ०संगीता
                                         लखनऊ


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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...