एक दर्द रहता था
जिस्म के भीतर,जो रह -रह कर
आँखों को नमकीन करता था
एक दर्द उतरता था
पन्नो पर स्याही में घुल कर
जो अपना हाल बयाँ करता था
एक दर्द ठहरता था
शीतल सी छाँव लेकर
जिसकी लिपि को पढ़ा न गया था....
-डॉ०संगीता
जिस्म के भीतर,जो रह -रह कर
आँखों को नमकीन करता था
एक दर्द उतरता था
पन्नो पर स्याही में घुल कर
जो अपना हाल बयाँ करता था
एक दर्द ठहरता था
शीतल सी छाँव लेकर
जिसकी लिपि को पढ़ा न गया था....
-डॉ०संगीता
No comments:
Post a Comment