Monday, 31 May 2021
कुछ बातें.... 3
माँ से बात की....नही की न....तुम किसी की बात को समझना ही नहीं चाहती हो.......तुम्हारे मन में पैठकर उसने जाने कौन सा बीज बो दिया है ,जिसकी बेलों में तुम उलझती गई .....जिसके अलावा तुम्हारे लिए जैसे कुछ बचा ही न हो।जिस माँ ने तुम्हें सब कुछ दिया उससे उसका सबकुछ छीनना चाहती हो।तुम जानती हो कि हम सबसे से ज्यादा वो तुम्हें चाहती हैं, तुमपर भरोसा करती हैं ,और तुम उन्हें ही छल रही हो।आज तुमने अगर इस घर की दहलीज़ पार कर ली तो शायद फिर कभी तुम खुद का सामना भी न कर पाओगी।जिन जंगली बेलों को तुम प्रेम समझ रही हो,काश .....ये बेलें प्रेम की होतीं...काश कि तुम देख पाती उसकी दो चमकती आँखों के पीछे का अँधेरा... जिसमें तुम गुम होना चाहती हो।अगर वो तुमसे सच्चा प्यार करता तो तुम्हारी आँखों पर रंगीन चश्मा न चढ़ाता।जिसे तुम उतारना ही नही चाहती।
प्रेम तो सागर सा है,पर तुम जिसमें उतर रही हो वो अंधा कुआँ है।रोक लो खुद को.... रोक लो...
-मेरी ही कलम से
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