Sunday, 30 May 2021
कुछ बातें...2
कब से कह रही हूँ, सो जाओ.....सो जाओ न .....पर तुम हो कि न जाने कौन सा बादल पकड़ना चाह रहे हो।उन रंगों को बादलों से लेना चाहते हो।जो तुम्हारे सामने बिखर जाते हैं उन्हें तो तुम, समेट ही नही पाते.....अब फिर.. मौन को न जकड़ो।
पता है ..जिंदगी बहुत ही चटपटी सी लगती है जब तुम अपनी जबान पर हजमोले मोले की गोली सा मुझे पाते हो ....तुम ही तो कहते हो ।तो अभी अपनी ही बातें याद कर लो।यूँ क्या देखते हो ...बस- बस अब तो रहने ही दो, कभी तो अपनी नज़रों को अपने आस -पास भी देखने की इजाज़त दे दिया करो।मैं और क्या-क्या कहूँ ..सब शिकायतें ही लगेंगी। तुम तो कभी -कभी तराजू के कांटे से लगते हो,उधर ही झुकते हो जिधर पलड़ा भारी हो।पर मैं क्या कहूँ ,मुझे तो तुम्हारी आवाज भी टॉनिक सी लगती है।बस तुम मेरे कानों में घुलते रहो...
...और... मैं जीती रहूँ...
- मेरी ही कलम से
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अपनी ओर
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