Thursday, 24 June 2021

कुछ बातें...9

बातें... न जाने कैसी-कैसी,एक छोटा सा मुंह है, उसमें एक प्यारी सी जीभ जिसकी हरकतें मन के भाव समझकर आवाजें होठों से बाहर कर देती हैं।बातें एक ऐसी राह पर चलती हैं जो मुड़ कर वापस होठों तक नही आतीं।जैसे राहें गायब होती रहती हैं।पर,ये गायब होती राहें किसी-किसी के दिल में घर कर लेती हैं।एक ऐसा घर जो खुद तो मजबूत से मजबूत बनती जाती हैं पर ,साँसों को कमजोर करती रहती हैं।यही कमजोर साँसे मनुष्य को भी तन मन से कमजोर बना देती हैं, कि कोई भी गहरी बात हावी होने लगती है।स्थितियाँ तब और भी गम्भीर हो जाती हैं ,जब ये बातें किसी और तक नही जा पाती हैं।यही बातें ही अवसादों के वो चट्टानी भूमि तैयार कर देती हैं कि फिर कभी बादल की बूंदें उसे सरस नही कर पातीं। अवसादों से घिरा व्यक्ति बात-बात पर मुस्कुराता है, हँसता है ,पर खुश नही हो पाता।बहुत कोशिश करता है वह कि लोगों से बातें करे,खुश रहे पर,उसके भीतर पसरी वीरानियाँ उसे दिन ब दिन जर्जर करती रहती हैं।खुशियों का न मिल पाना दुखी नही करता बल्कि खुश रहने का दिखावा करना बहुत दुख देता है।खिलखिलाती आँखों का सूनापन कोई भाँप नही पाता।इन सब का कारण शायद हमारी महत्वाकांक्षाएं होती हैं ,ये चाहना बड़ा ही घातक होता है।जब इंसान के पास वो सबकुछ होता है ,जो जीने के लिए काफी होता है।पर ,सच यह है कि,यही सिर्फ काफी नहीं।लोगों की भीड़ बस मन के बाहर ही होती हैं।जब तक इंसान मन से खुश नही होता तबतक उसे कोई भी बात खुश नहीं कर सकती।कितना मुश्किल होता है खुश रहना और कहना आसान "मैं खुश हूँ"... -मेरी ही कलम से

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...