Wednesday, 23 June 2021

कुछ बातें...8

रात बड़ी ही विचित्र सी लगती है, और एकांत में रात अपनी ही खुमारी में रहती है।ऐसा लगता है वो किसी बेचैन को पाकर और भी विकल हो उठती है, तभी तो वह जगाना चाहती है अपने अंतिम अंधेरे तक।आधी रात में जुगनुओं से फैले तारे पूरे आकाश को भर देते हैं, पर मन का कोना -कोना खाली सा लगता है,और ये खालीपन तब ज्यादा लगता है जब मन अनकही बातों से भरा होता है।कैसा विरोधाभास है ...है न...सारे विचार अपनी बाहें पसारे चिंतन के लिए विवश करने लगते हैं।देखा जाये तो यही वह समय होता है जब हम अपने आप से बात कर रहे होते हैं ,अपने सत्य को पहचान रहे होते हैं।संसार की क्षणभंगुरता का ज्ञान भी इतनी तत्परता के साथ होता है कि मन का विचलन बढ़ने लगता है ,सम्भवतः यही विचलन रहा होगा जिसने सामान्य पुरुषों को सत्य का बोध कराकर महापुरुष बनाया होगा। यह सत्य,जिसे संसार जानता है पहचानता है पर उसे स्वीकार करने से डरता है।जीवन का परम सत्य मृत्यु जिससे जीवन भागता है।जीवन का सारा दर्शन रात के अंतिम प्रहर तक सोने नही देता है।सबसे बड़ी विचित्रता तब दिखती है,जब सूरज की पहली किरण अलसाई सी रात को सुबह में बदल देती है।मानव का मन भी वही,तन भी वही,सत्य भी वही जीवन और मृत्य भी वही पर,चिन्तन अपनी राह पर रुक जाता है ,और एक नया दिन नई ऊर्जा,और नए जीवन अनुभवों के लिए बाहें पसारे स्वागत करने लगता है।आस-पास का वातावरण, जीवनचर्या आदि हमें अपनी क्षणभंगुरता का बोध नही कराते बल्कि एक नवीन संकेत उस सत्य की ओर करते हैं जिसे हम समझना नही चाहते...यही न समझना मोह और समझ जाना मोक्ष के समीप लाता है। - मेरी ही कलम से

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...