Friday, 27 May 2022

कुछ बातें....15

शाम कटती नहीं और रात बीतती नहीं पर सुबह हो ही जाती है। साँसों का बैलेंस कम हो रहा है।शरीर की एक्सपायरी डेट तो ईश्वर ने कहीं मेंशन ही नही किया है।सुन रहे हो ,सुनो न ....कुछ सुन लिया करो ,कल को पता नही कुछ कह पाऊँ या नहीं। सुन तो रहा हूँ ,तुम कहती जाओ।क्या कहूँ...ऐसा लगता है मेरा कुछ खो गया है तुम्हें बता भी नहीं सकती ....पर कुछ है जो मेरे पास नहीं है। यह तुम्हारे मन का फितूर है, क्यों दार्शनिक बन रही हो ।सब कुछ तो है तुम्हारे पास,और क्या चाहिए।सो जाओ....मुझे तो सोना है।(जया के होठ मुस्कुराने की कोशिश करते हुए)हम्ह!...बिल्कुल, गुडनाइट।(अंधेरी कोठरी में उजास खोजती सी ,छत से नजरें मिलते हुए जया)अनुज तुम मुझे कैसे समझ सकते हो,तुम स्त्री जो नहीं हो।तुम्हारा मुझे समझने की बात कहना ही 'न समझने' की बात कह देता है।मैंने अनगिनत बार महसूस किया है।अपनी भीतरी बेचैनी को जो तुमसे सब कुछ कह कर शान्त होना चाहती है।पर ,बिना कहे ही सुबह का इंतजार करती मेरी आँखें पलकों में छुपी रहती है।मेरी सभी सहेलियां जब भी एक साथ होती हैं,वह जताती हैं कि वे अपने पति को परमेश्वर समझती हैं, उनके लिए विधि -विधान से पूजा करती हैं।मैंने खुद देखा है कितनी सहेलियों के पति भरे समाज में उनका अपमान कर देते हैं, शराब पीकर अत्याचार करते हैं, और भी बहुत कुछ।फिर भी,वो सभी सब कुछ कैसे भूल जाती हैं।एक साड़ी और सोने की बाली पाकर खुश रहती हैं।तुमने तो मुझे सोने के कई गहने दिलवाए हैं।साड़ियां भी....। महिलाओं की संगोष्ठी में न जाने क्यों मैं सभी को ऐसा फील नहीं कर पाती।पूजा में भी मेरा मन नहीं लगता।क्या मैं तुमसे प्यार नहीं करती ... उन सभी औरतों की तरह तुम्हें परमेश्वर कहने के लिए मेरी जुबान क्यों नहीं खुलती...बता सकते हो...?बोलो... मेरी ही कलम से... -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...