बहुत ही कठोर है ये शब्द
जहाँ भावनाएं शून्य
असीम मोह भी तुच्छ
किसी का परित्याग,सरल नहीं
अंदर से टूटा बिखरा इंसान
तिनके के सहारे से नदी पार करना चाहता है,पर वह कर नहीं सकता
अबोध पन की मित्रता में अगर बोध आ जाए तो उसे भी त्याग देना ही सही है
गहरी नींद से जैसे किसी ने झकझोर कर जगाया हो ....
Dr. Sangita
Lucknow
No comments:
Post a Comment