बहुत ही सलीके से ,करीने से सजा कर रख देने से रिश्ते कभी भी महकते नहीं हैं...सभी चाहते हैं कि उनकी ताजगी बनी रहे... इसके लिए उनके निजत्व में बेवजह की ताक -झाँक जरूरी नहीं ...जेहन में एक कशिश सी महसूस होना जरूरी है...जब यह कशिश कम लगने लगे तो बातों की डोर थामे रखना जरूरी हो जाता है...रिश्ता कोई भी हो जब वह मुरझाने लगता है तो बीती मधुर स्मृतियों से उन्हें बार -बार हरा किया जा सकता है....कोई भी रिश्ता कभी भी पूरी तरह नहीं टूटता....कुछ न कुछ बचा रह जाता है किसी न किसी रूप मे... लेकिन जब कोई रिश्ते से बाहर आने के लिए मन बना ले तो उसे रोकना मुमकिन नहीं क्योंकि रिश्ता बहुत ही जटिल भाव है इसमें बंधने से पहले और मुक्त होने के बाद ही हम जान पाते हैं कि हम रिश्ते में है या नहीं....अपने मन को संयमित रखना बहुत जरूरी है.
मेरी ही कलम से.....
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