Friday, 10 October 2025

संसार जिसे मैंने चुना

 मेरी हर कविता उसी से शुरू हुई

जिसने मेरी नजरों को पल भर के लिए बांधा था

जीवन का सबसे बड़ा भ्रम प्रेम

सबसे बड़ा छल मोह

खुद को समर्पित करना सबसे बड़ी भूल बन गया

क्योंकि वह फूल बनकर कांटो सा तन गया

समझदारी की पहली ठोकर

लड़खड़ाते हुए गिरने का पहला अनुभव

अनुभवहीन क्या समझेगा

इन पुतलियों पर चढ़ी परतों ने देखते ही न दिया था

सत्य का स्वरूप तो कुछ और ही था

शीशे में खुद को देखा

नियति पीछे से मंद मुस्कान लिए मुझे घेर रही थी

मेरा दुख, मेरी खुशी,मेरा हंसना, मेरा रोना,

मेरे अरमान,मेरे सपने,मेरी छाया, मेरी पहचान,

हर जगह "मैं " से ही भरी थी

इतनी सीमित संकीर्ण दुनिया मेरी नहीं थी

इसे पहचान में सालों गवा दिए

किस ओर बढ़ रही थी और किसी लिए हुए?

क्या वह मेरा था?

जिसे जकड़े बैठी थी

वह मेरा है, सिर्फ मेरा है और मेरा ही रहेगा

यही भ्रम पाले थी

शरीर को तेज जकड़ने से मन पहले मुक्त हो जाता है

फिर, वह वापस कभी नहीं आता

इतनी छोटी सी दुनिया नहीं है मेरी

अपने होने का कारण समझना होगा

व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़ना होगा

मेरी दुनिया का विस्तार अनंत है

मुझे नया संसार चुनना होगा

डॉ संगीता 

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