हथेली पर मेहंदी रचती तो है
पर खिलती नहीं
कैनवास सी हथेलियों पर
तुम कुछ उकेर दो
खिल जाएंगी ये
कमलदल की तरह
शब्द गढ़ने वाला मन का कुरूप भी हो सकता है
एक ही सवाल मन में कब से है
कोई टूट क्यों जाता है,
मेरे जबाब से
मैं अक्सर कुछ का दिल तोड़ दिया करती हूँ
उनकी ही बातों से
उनका रुख मोड़ दिया करती हूँ...
साथ चलकर कुछ दूर ....
वापस वो मुड़ न जाए
सोच कर ही मैं
साथ छोड़ दिया करती हूँ
Dr. Sangita
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