हम भीगे जग भीग गया
हम जो सिहरे जग सिहर गया
ये रीत है कैसी दुनिया की
खुद का दुःख जग का दुःख लगता,
खुद का सुख सबका सुख लगता,
भीगती फसलों को निहार कर
उसको लगता वसुधा तरल हुई
वह भूल गया सब लोभ मोह
खिलती फसलों की हरियाली में
करता विनती वह बार बार
हे प्रभु!ज्यादा न दे तो कम न कर
प्यासी वसुधा की प्यास बुझा
सिहरी वसुधा को तपन दिला
हर कंठ को मिले बहती गंगा
पर नदियों को भी मर्यादा दे,
छप्पर से गिरती जल की लकीरों में,
कष्टो का भी न आभास मिले
भूखे पेट भी कर लें राम भजन
तू जब जब दे जग को दे
पा लूंगा मैं भी अपने हिस्से का
तू दानी है अब देर न कर
जग को जब तब सद्बुद्धि दे,
हे प्रभु! जब दे तब सबको दे
मानवता की परिभाषा दे......
---संगीता---
हम जो सिहरे जग सिहर गया
ये रीत है कैसी दुनिया की
खुद का दुःख जग का दुःख लगता,
खुद का सुख सबका सुख लगता,
भीगती फसलों को निहार कर
उसको लगता वसुधा तरल हुई
वह भूल गया सब लोभ मोह
खिलती फसलों की हरियाली में
करता विनती वह बार बार
हे प्रभु!ज्यादा न दे तो कम न कर
प्यासी वसुधा की प्यास बुझा
सिहरी वसुधा को तपन दिला
हर कंठ को मिले बहती गंगा
पर नदियों को भी मर्यादा दे,
छप्पर से गिरती जल की लकीरों में,
कष्टो का भी न आभास मिले
भूखे पेट भी कर लें राम भजन
तू जब जब दे जग को दे
पा लूंगा मैं भी अपने हिस्से का
तू दानी है अब देर न कर
जग को जब तब सद्बुद्धि दे,
हे प्रभु! जब दे तब सबको दे
मानवता की परिभाषा दे......
---संगीता---
No comments:
Post a Comment