जब कोई रिश्ता पेंडुलम जैसा हो जाता है, तो वो किसी को सुख नही पहुचाता। वह सम्बन्ध मात्र कालक्रम का द्योतक बना रहता है, कि सम्बन्धित व्यक्ति कितने समय तक अनचाहे रूप से जुड़ा रहा। मन तो घड़ी की सुईयों के साथ पीछे ही छूट जाता है। समाज में विशेषतः पति- पत्नी का सम्बन्ध कुछ समय बाद ऐसा ही हो जाता है, पर उस सम्बन्ध में बंधे रहने का सबसे बड़ा कारण अपनी सन्तान होती है, जिसे न माँ छोड़ना चाहती और न पिता के लिए यह सरल होता है। दोनों चाहे न चाहें फिर भी उन्हें साथ रहना होता है। सम्बन्धों की इस विवशता के लिए मध्यम मार्ग पति- पत्नी के आपसी सामन्जस्य में होता है...पर अविश्वास और असहयोग का अपारदर्शी तत्व बीच में आता है।
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अपनी ओर
पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...
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कुछ खरोंचे हैं मन -बदन पर तुम्हें जो दिखती हैं वो लकीरें खिंची हैं ... ढाल रही है जिंदगी अपने हिसाब से बेढब पत्थर सी वो पड़ी मिली थी... परिस्...
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मीरा ने अपनी सारी सही करते हुए अतुल की ओर देखा। उसके देखते ही अतुल नजरें चुराते हुए ...फिर अचानक से उसपर झपटते हुए कहा,अब अपना रोना - धोना ...
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जैसे जिंदगी एक तलाश थी तुम पर आकर रुक गई। कतरा-कतरा बह रहा तूँ रग-रग में जैसे .... शाम ए जिंदगी की बाती तुमसे मिलके जल उठी। ...
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