अन्तर्मन का दीप...जलता है तुमसे
तुम सृष्टि का कण कण आलोकित करते हो,
भावनाओं के पार तुम्हारा तेज
करते हो सब सूक्ष्मतम संचालित...
फिर क्यों नियति सब कुछ अलग करती है,
तुम्हें पाने में लगेंगे कितने जन्म
कुछ तो बता दो....
ऋषि मुनियों सा तेज नही है मुझमे,
फिर भी अभिलाषा है प्रबलतम तुम्हारे लिए....
तुम सृष्टि का कण कण आलोकित करते हो,
भावनाओं के पार तुम्हारा तेज
करते हो सब सूक्ष्मतम संचालित...
फिर क्यों नियति सब कुछ अलग करती है,
तुम्हें पाने में लगेंगे कितने जन्म
कुछ तो बता दो....
ऋषि मुनियों सा तेज नही है मुझमे,
फिर भी अभिलाषा है प्रबलतम तुम्हारे लिए....
No comments:
Post a Comment