श्रृंगार हो बसन्त का
जब तुम मुस्कुरा दो ।
अपने प्रेम की शीतल चाँदनी,
कपूर सी उजली रात में,
रेशम सी चिकनी अनुभूतियों से
हृदय की गहनतम गुफाओं में
प्रेमरङ्ग में सराबोर....
अनुराग तुम्हारा चातक सा
मेरे लिए तुम्हारा प्रेम अर्पण...
जिससे मन मोहित हो गया।
तुम्हारे असीम प्रेम की अतल गहराइयों में,
उतरने को आतुर मेरा हृदय...
तुम्हारे प्रेमरस से अभिभूत हो गया।
उस बीच तुम्हारी ..स्निग्ध मधुसिंचित वाणी ने
खींच सा लिया.. अपनी ओर
तुमने मेरा जीवन ....
मेरा मन उपवन....
मेरे हृदय के हर स्पंदन में
प्रेम ही प्रेम भर दिया.....
-संगीता
जब तुम मुस्कुरा दो ।
अपने प्रेम की शीतल चाँदनी,
कपूर सी उजली रात में,
रेशम सी चिकनी अनुभूतियों से
हृदय की गहनतम गुफाओं में
प्रेमरङ्ग में सराबोर....
अनुराग तुम्हारा चातक सा
मेरे लिए तुम्हारा प्रेम अर्पण...
जिससे मन मोहित हो गया।
तुम्हारे असीम प्रेम की अतल गहराइयों में,
उतरने को आतुर मेरा हृदय...
तुम्हारे प्रेमरस से अभिभूत हो गया।
उस बीच तुम्हारी ..स्निग्ध मधुसिंचित वाणी ने
खींच सा लिया.. अपनी ओर
तुमने मेरा जीवन ....
मेरा मन उपवन....
मेरे हृदय के हर स्पंदन में
प्रेम ही प्रेम भर दिया.....
-संगीता
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