Thursday, 30 November 2017

मधुर अनुभूतियाँ...

श्रृंगार हो बसन्त का
जब तुम मुस्कुरा दो ।
अपने प्रेम की शीतल चाँदनी,
कपूर सी उजली रात में,
रेशम सी चिकनी अनुभूतियों से
हृदय की गहनतम गुफाओं में
प्रेमरङ्ग में सराबोर....
अनुराग तुम्हारा चातक सा
मेरे लिए तुम्हारा प्रेम अर्पण...
जिससे मन मोहित हो गया।
तुम्हारे असीम प्रेम की अतल गहराइयों में,
उतरने को आतुर मेरा हृदय...
तुम्हारे प्रेमरस से अभिभूत हो गया।
उस बीच तुम्हारी ..स्निग्ध मधुसिंचित वाणी ने
खींच सा लिया.. अपनी ओर
तुमने मेरा जीवन ....
मेरा मन उपवन....
मेरे हृदय के हर स्पंदन में
प्रेम ही प्रेम भर दिया.....
                                   -संगीता

No comments:

Post a Comment

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...