Tuesday, 28 November 2017

शेष....

उस ...माँ के पास मैं गई उनके बेटों को बेरुखी भरी नजरों से देखा और कहा-जिस माँ ने जन्म दिया वो आज तुमलोगों पर इतनी बोझ कैसे बन गई?इतना सुनते ही वो भड़क गए और बोले, मैडम आपको क्या पता जिस पर पड़ती  वही जनता है'उपदेश देने तो सभी आ जाते हैं' इतना सुनकर मैं थोड़ी ठिठकी और शांत हो गई मैं तो शांत हो गई पर उनके भीतर के ज्वालामुखी के छिद्र जैसे अचानक से खुल गए हों ।लावे की तरह उनका आक्रोश फूट पड़ा।मेरे बिना पूछे ही वो बड़बड़ाने लगे-'बाप मर गवा हमरा ,ईई   हमन क जिनगी खराब कर दिहिस.... हमरे बड़के चाचा कहत रहि गएन ई उनसे बियाह नई किहिस उनके एतना धन धरम रहा ....आज हमन क जिनगी बनि गवा होतीं...हमन के हमेशा दुई दुई पिसा खातिर तरसलिं..... ई कहिस हम कौनो के आगे झुकब न .....एकरा शान में हमन क जिनगी जहन्नुम बनी गवा' इतना सुनने के बाद मेरे कदम न आगे बढ़े न पीछे हों समझ में नही आ रहा था की उस माँ की क्या मजबूरी रही होगी?यदि किसी का पति असमय गुजर जाए तो उसे किसी पैसे वाले से विवाह कर लेना चाहिए या अपने बच्चों की परवरिश अपने बूते पर करनी चाहिए.... क्या उस माँ की कोई कामना शेष न रही होगी.... क्या उसे हर प्रकार के सुख की आवश्यकता नही रही होगी..... उसके संघर्षों का कोई महत्व नही ,उसके त्याग का कोई औचित्य नही ......उसकी ममता के तन्तु  में वो बल नहीं जो अपने बेटों को बांध सके..... उसके बेटों की मनः स्थिति  ऐसी क्यों बनी?ऐसे न जाने कितने क्यों ? मेरे मन में उथल -पुथल करने लगे जिसका उत्तर तलाशने में मुझे न जाने कितना समय लग जाए इसका अंदाजा मुझे नही।ऐसी भावना सिर्फ उनकी नही है ऐसे न जाने कितने होंगे... क्या आने वाली पीढियां वय वृद्धों के आशीष तले नही रहना चाहती?क्या हम अपने बच्चों से भी यही उम्मीद करेंगे की वो हमारे बारे में ऐसी ही सोच रखें?
                                                                                                            -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...