Friday, 1 December 2017

तुम हो यहीं कहीं....

तुम्हारे दामन में
तुम्हारे पहलू में बैठा है कोई....
जिस ओर तुम्हारी नजर जाती ही नही
या यूँ कहूँ कि
लौट आती है तुम्हारी नजर मुझसे टकराकर
जैसे मैं कोई सागर की लहर हूँ
जो रोज हर क्षण टकराती रहती है,
सागर किनारे चट्टानों से
तुम्हारे आँखों में उमड़ते वो ....
प्रेम के बादल
जो बरस जाना चाहते थे मुझपर
कोई तो बात थी तुम्हारे चेहरे की कशिश में
या... आँखों की चितवन में
क्यों ....खींचती हैं वो आँखें बार बार
यादों के तलघर में
जो लम्हें गुजार दिए तुम्हारे होने में
तुम्हारी हर एक खिलती मुस्कान से
तुम्हारी हर एक याद से
तुमसे ,
दूरी मेरी ...
फासलों की नही .....बरसों की है
तुम हो गए हो दूर कितने .....
मेरे करीब होने पर भी
आज भी मैं वहीं हूँ..... पर
 कदमों के नीचे की जमीन बदली सी है,
हर एक आहट पर मुड़कर देखना ,
जैसे मेरी आदत सी बन गई है ,
मन कहता हैकी तुम नही हो
पर ...दिल कहता है -
तुम कहीं तो हो .......
                                   -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...