Friday, 1 December 2017

विहान....

नव युग की नवसिंचित बेलें फैल रही हैं जल थल में
तुमने नया राग है छेड़ा ...
भारत के पावन कर्ण -कर्ण में
सुना किसी ने मधुर राग
किसी को भाया सुरा साज
तुम देख रहे हो संजय से
भारत को अति महान बनते
तुम भारत के वंशज हो
अतिभार तुम्हारे स्कन्धों पे
मानवता का पाठ  पढ़ाना पड़ेगा तुमको
इस जग को पग पग में....


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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...