सीढ़ियों से उतरते हुए आभा ने अपने बारे में जो सुना वो सुनकर उसके होठों पर तैरती मुस्कान किनारा नही पा रही थी।उसने तो सोचा भी न था उसकी शादी की बात घर वाले करना चाह रहे हैं।मन ही मन हो रहे प्रिय से सम्भावित संवादों में खोई उसे पता ही न चला कि कबसे माँ आवाज़ लगा रही है,जैसे बेमौसम बारिश में छत पर सूखते कपड़े उठाने के लिए वो दौड़ी हो ऐसी दौड़ देखकर भाभी बिना व्यंग्यवर्षा के न रह सकीं ,'अरे! नन्द रानी के पैरों में पंख लग गया है, जो उड़े जा रही हैं' आभा के चेहरे की आभा जैसे अकस्मात् बुझ गई हो ,उसके चेहरे की छिपी झुर्रियाँ जैसे अचानक से उभर आई हों, माथे की अनगिनत लकीरों में उसकी छिपी किस्मत वाली लकीर गुम हो गई हो ,उसकी पलकें गीली हो गईं ,आँखों के सामने पलभर में रोज की दिनचर्या के दृश्य उभर आए, अपने सामने से दृश्य को पर्दे सा हटाते हुए आभा ने माँ से इतना ही कहा-माँ! आज घर का कोई जरूरी सामान तो नही लाना है?आज....महीने का आखिरी दिन है ..तो.....।भाभी का मुँह खुला ही था की माँ बोल पड़ी, 'अपने लिए भी कुछ सोच लिया कर ....घर में कुछ न कुछ तो घटा ही रहता है, तूँ जा ।
आभा के कदम आगे बढ़ रहे थे और मन पीछे भाग रहा था ,उसका मन उसके कदमों से मेल नही बिठा पा रहा था ।आज फिर प्रदीप का चेहरा बार- बार आँखों से चिपक जा रहा था जाले के जैसा , यादों की मकड़ियों ने इतने जाले पलभर में कैसे बुन डाले ?अपनी यादों से अफनाकर जैसे वो झटके से दूर खड़ी हुई थी पर मन पर सवार मधुर-तिक्त अनुभूतियाँ आपस में उलझ रही थी।बस एक ही वाक्य आभा के कंठ से बाहर आना चाह रहा था, ' मुझे कमजोर नही होना है।' आभा खुद से लड़ने लगी,हर क्यों का मैं ही जबाब हूँ ...क्या हुआ इस बार भी भाई यही कहेगा 'लड़के वाले तेरे गुन जान गए होंगे..... तभी तो....।माँ ...अपनी बक्से से वो ....चूनर निकालकर फिर रख देगी ....।भाभी अपनी कुटिल मुस्कान से .....(जैसे कोई शब्द न सूझ रहा हो उनके व्यंगबाणो के लिए )...ह्म्म्म्मह.....और ,पापा की कन्धों में इतना बल ही कहाँ... छोटी बहन ........मेरे बाद शायद .....वो भी .....(गर्म सासों को जैसे एकसाथ झटके से मुक्त कर दिया हो)....(फिर यादों में घिरते हुए)....प्रदीप !तुम्हें पता है, तुमसे मैं इतनी नफरत करना चाहती हूँ की तुम मुझसे दूर हो जाओ... पर तुम मुझे और भी जकड़ लेते हो अपनी यादों में ....काश तुम्हारे साथ स्वर्गमयी सपनों के साथ उस रात ....न निकली होती ...न तुम मुझे अपनी वासना का ग्रास बनाते..... न मैं अपने प्रेम का खण्डित रूप देखती ..।मेरी आत्मा का रुदन गर तुम सुन पाते तो ..आज तुम्हें....(सासों का गुबार फिर झटके से बाहर आया ,खुद को समझाते हुए)....खैर...शायद मेरी किस्मत में तुम्हारे बाद कोई और .....मैंने सोचा न था।आज घर पर अपनी शादी की बात सुनकर मैं बहुत खुश हुई थी। शायद 45 साल की अर्धविवाहिता को उसका प्रिय मिल जाए .....पर एक बात सच कहूँ.... जब भी मेरी शादी की बात किसी से होती है तो मुझे उसमें तुम्हारी शक्ल दिखाई देती है।...उफ्फ!!!..रोज ही मुझे इस तार में उलझ जाना पड़ता है.... खेलावन भैया! आपसे कितना कहा है ,इसे बांध दीजिए पर ....(अपने ऑफिस के काम में लगते हुए)....आज फिर घर से पचास किलोमीटर का समय जैसे मिनटों में तय कर लिया ..पता ही न चला।
-संगीता
आभा के कदम आगे बढ़ रहे थे और मन पीछे भाग रहा था ,उसका मन उसके कदमों से मेल नही बिठा पा रहा था ।आज फिर प्रदीप का चेहरा बार- बार आँखों से चिपक जा रहा था जाले के जैसा , यादों की मकड़ियों ने इतने जाले पलभर में कैसे बुन डाले ?अपनी यादों से अफनाकर जैसे वो झटके से दूर खड़ी हुई थी पर मन पर सवार मधुर-तिक्त अनुभूतियाँ आपस में उलझ रही थी।बस एक ही वाक्य आभा के कंठ से बाहर आना चाह रहा था, ' मुझे कमजोर नही होना है।' आभा खुद से लड़ने लगी,हर क्यों का मैं ही जबाब हूँ ...क्या हुआ इस बार भी भाई यही कहेगा 'लड़के वाले तेरे गुन जान गए होंगे..... तभी तो....।माँ ...अपनी बक्से से वो ....चूनर निकालकर फिर रख देगी ....।भाभी अपनी कुटिल मुस्कान से .....(जैसे कोई शब्द न सूझ रहा हो उनके व्यंगबाणो के लिए )...ह्म्म्म्मह.....और ,पापा की कन्धों में इतना बल ही कहाँ... छोटी बहन ........मेरे बाद शायद .....वो भी .....(गर्म सासों को जैसे एकसाथ झटके से मुक्त कर दिया हो)....(फिर यादों में घिरते हुए)....प्रदीप !तुम्हें पता है, तुमसे मैं इतनी नफरत करना चाहती हूँ की तुम मुझसे दूर हो जाओ... पर तुम मुझे और भी जकड़ लेते हो अपनी यादों में ....काश तुम्हारे साथ स्वर्गमयी सपनों के साथ उस रात ....न निकली होती ...न तुम मुझे अपनी वासना का ग्रास बनाते..... न मैं अपने प्रेम का खण्डित रूप देखती ..।मेरी आत्मा का रुदन गर तुम सुन पाते तो ..आज तुम्हें....(सासों का गुबार फिर झटके से बाहर आया ,खुद को समझाते हुए)....खैर...शायद मेरी किस्मत में तुम्हारे बाद कोई और .....मैंने सोचा न था।आज घर पर अपनी शादी की बात सुनकर मैं बहुत खुश हुई थी। शायद 45 साल की अर्धविवाहिता को उसका प्रिय मिल जाए .....पर एक बात सच कहूँ.... जब भी मेरी शादी की बात किसी से होती है तो मुझे उसमें तुम्हारी शक्ल दिखाई देती है।...उफ्फ!!!..रोज ही मुझे इस तार में उलझ जाना पड़ता है.... खेलावन भैया! आपसे कितना कहा है ,इसे बांध दीजिए पर ....(अपने ऑफिस के काम में लगते हुए)....आज फिर घर से पचास किलोमीटर का समय जैसे मिनटों में तय कर लिया ..पता ही न चला।
-संगीता
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