Saturday, 16 December 2017

वो जो है....

आज क्यों हवाओं में कोई घुला सा लगता है
जैसे वो यहीं कहीं बिखरा हुआ है
वो तो यूँ ही ....यहाँ वहाँ फिरता रहता है
जैसे.... उसे उड़ना ही लुभाता है
उसकी हर एक उल जलूल बातें भी  हसाती ही हैं
जैसे हसाते ही रहने की फितरत है उसकी
वो जो है .....
दिखता ही नही ....
रहता है हर कहीं....
पर ...
मुझसे ही मिलता नही....
कैसे कहूँ की ....
वो मेरा ही मन है
मुझमें ही रह कर मेरे साथ चलता नही...
जरा सी बात भी जिसे छू जाती है
वो जो है...
बस वही है...
जो खुद की ही करता है....
                               -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...