Saturday, 9 December 2017

आओ तो सही

अकुलाते मन की पीड़ा को 
तुम समझो तो सही 
ऊँचे भवन ...अनुकूलित गृह से 
एक बार निकलो तो सही
जीकर देखो उनका जीवन 
जिनको जीते देखा ही नही,
आशाओं की दमघोट गलियों से
एकबार गुजरो तो सही ,
तुम्हारे नीति नियम सब कुछ को
एकबार भोगो तो सही ,
सत्ताधारी चोले की गर्मी से निकल
हम जैसा बनकर देखो तो सही,
सह पाओगे क्षण भर भी नही 
अपने ही थोपे भार सभी 
हम जनता हैं 
हम हैं तो तुम हो 
तुमसे हम ....कभी भी नही 
अपने हाथों की शक्ति को 
कभी तो ,
महसूस करने दो ...
हम भी जान सकें 
हम जीते हैं 
सबसे बड़े संविधान तले 
जहाँ जनता के बनाए जनप्रतिनिधि
जनता के ही रक्त के प्यासे बन बैठे 
इन्हें... जोंक ...दीमक
कुछ भी कह लो 
ये इन सबसे भी ऊपर हैं 
कुछ लोग जो हैं भलेमानुस
वो शासन  की कठपुतली हैं
आटे में  नमक जैसे ये हैं 
अनाचार की गोल कड़ी में 
दोष  कहूँ मैं ...किसका है..
अपने अधिकारों को पाने की चाह में 
कुछ प्रयास करो तो सही ..
                                     -संगीता


 

 

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...