Saturday, 9 December 2017

दुखती रग ....

तुमने हमको  बहुत सताया
अब हम तुम्हें सताएंगे
जैसे गिरते थे अपने आँसू
वैसे तुम्हें रुलाएंगे
तुम जीत के देखो हृदयसाम्राज्य  जगत का 
हम तुमसे हार जाएंगे,
हमारा हाल... बेहाल तुम्हीं से है
तुम्हारा अंत  है ...दुःख का अंत
तुमने काया पर जख्म दिए
और ,बार -बार कुरेदा भी
अधिकारों का करते भ्रमलेपन
देते हो झूठे दिलासे भी ,
हमारी अपनी दुखती रग
छिपा न सके तुमसे कभी
और... बार -बार करते प्रहार
अदृश्य चेतना द्वारों पर
स्पंदनरहित हुई धड़कन
अब दुखती नही दुखती रग भी ...

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...