Tuesday, 30 January 2018

खुद को

धरती गोल है
आज समझ आया ...
विस्तार पाने के लिए
खुद को उठाया
अनंत की गोद में
सब, तुच्छ नजर आया
कण-कण की विशालता
जब ,
दृष्टि परख पाया..
                     -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...