चाहती हूँ
दिल खोल कर रख दूँ
उसके सामने
पर वो
कहीं...
ठोकर न मार दे
डरती हूँ
उससे भी बड़ा
डर है मुझे
वो ...मुझे
समझेगा नही
जो भी हूँ... मैं
दिखा नही सकती
खुद की बिगड़ी
छवि ...
सुधार नही सकती
और...
न जाने कहाँ से
भर आती है
नफ़रतें
जिन्हें ...
जितना भी चाहूँ
निकाल नही पाती..
और ....घिर आती हूँ
शक के घेरे में
जिसे मैं....
-संगीता
दिल खोल कर रख दूँ
उसके सामने
पर वो
कहीं...
ठोकर न मार दे
डरती हूँ
उससे भी बड़ा
डर है मुझे
वो ...मुझे
समझेगा नही
जो भी हूँ... मैं
दिखा नही सकती
खुद की बिगड़ी
छवि ...
सुधार नही सकती
और...
न जाने कहाँ से
भर आती है
नफ़रतें
जिन्हें ...
जितना भी चाहूँ
निकाल नही पाती..
और ....घिर आती हूँ
शक के घेरे में
जिसे मैं....
-संगीता
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