Sunday, 28 January 2018

कर नही सकती...

चाहती हूँ
दिल खोल कर रख दूँ
उसके सामने
पर वो
कहीं...
ठोकर न मार दे
डरती हूँ
उससे भी बड़ा
डर है मुझे
वो ...मुझे
समझेगा नही
जो भी हूँ... मैं
दिखा नही सकती
खुद की बिगड़ी
छवि ...
सुधार नही सकती
और...
न जाने कहाँ से
भर आती है
नफ़रतें
जिन्हें ...
जितना भी चाहूँ
निकाल नही पाती..
और ....घिर आती हूँ
शक के घेरे में
जिसे मैं....
               -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...