जब हम किसी व्यक्ति पर विश्वास करते हैं ,तो वह व्यक्ति हमारे लिए सबसे प्रिय होता है।उसके हर बात पर ,हर व्यवहार पर खुद से ज्यादा विश्वास करने का मन होता है ,भले ही उस व्यक्ति की वास्तविकता कुछ भी हो ,उस ओर हमारा ध्यान नही जाता ,हम तो उसे स्वयं के जैसे निष्कपट ही मानते हैं।व्यक्ति अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करने में कभी -कभी असमर्थ हो जाता है ,उसे चाहिए होता है एक ऐसा समर्थ स्कन्ध जिसपर संसार की हर प्रकार की समस्याओं से परे होकर सर टिका सके । निर्लिप्त भाव से उसके समक्ष अपना हृदय आवरणरहित कर सके.... कुछ लोगों को ऐसे सभ्य मिल भी जाते हैं ....पर उनका उत्तरदायित्व जीवनभर का रहता है ....सामने वाला व्यक्ति भले ही विश्वास करे न करे उस व्यक्ति को अपने पर किए गए विश्वास को खण्डित नही करना चाहिए।कोई व्यक्ति कुछ समय बाद यदि विश्वास की शिला पर टिका नही मिलता तो उसपर पुनः विश्वास करना स्वयं के प्रति अन्याय करना होगा यदि हम ऐसा करते हैं ,तो हम स्वयं को दण्डित करने का उपक्रम करते हैं ....ऐसे व्यक्तियों से दूरी बनाने का एक मार्ग ....उस व्यक्ति पर फिर कभी विश्वास न किया जाए ....भले ही उसे आपका सामीप्य प्राप्त हो पर उसे आपकी निकटता का ,आपके दुःख का आभास भी न हो ।आपके पास आपसे बढ़कर कोई दूसरा नही जो आपके आत्मबल को बढ़ा सके ।धैर्य के साथ ........पूर्णतः विखण्डित
हृदय को सबल बनाने का एक ही मार्ग है .....स्वयं को क्षणिक प्रसन्नता के अवसर से दूर न रखना।आप जितने ही प्रसन्न होंगे ,अविश्वासी को उतनी ही भली प्रकार से दण्डित कर पाएंगे ....पुनः न मिलने वाले जीवन को ऐसे अविश्वासियों के स्पर्श से स्वयं को धूमिल न मानकर ,प्रसन्नता को अपनी शक्ति बनाने में ही जीवन का मर्म है। -संगीता
हृदय को सबल बनाने का एक ही मार्ग है .....स्वयं को क्षणिक प्रसन्नता के अवसर से दूर न रखना।आप जितने ही प्रसन्न होंगे ,अविश्वासी को उतनी ही भली प्रकार से दण्डित कर पाएंगे ....पुनः न मिलने वाले जीवन को ऐसे अविश्वासियों के स्पर्श से स्वयं को धूमिल न मानकर ,प्रसन्नता को अपनी शक्ति बनाने में ही जीवन का मर्म है। -संगीता
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