Saturday, 13 January 2018

सुलझेगा ....!

उलझनें मन की ....
सुलझाने से
और ,भी
उलझने लगी हैं
वो भी,
निर्जीव सी पड़ी
उन स्मृतियों में
जिन्हें  स्मरण में लाना भी,
कष्टदायी है,
कितनी ही गाठें ,
मन के धागे में
पड़ती जा रही हैं,
आराम -आराम से ,
बचा- बचा कर ,
एक -एक धागा खोलने में
कितनी ही रातें गुजर जा रही हैं,
कुंठाओं के ,
बनते ढेर,
पहाड़ की शक्ल में ,
खुद को ,
छोटा ,बना रहे हैं ।
कहते हो तुम बार -बार,
सुलझ जाएँगी ये उलझनें,
पर,
वही उपक्रम ,
बार- बार.......
सुनो...!
कहीं .....ये उलझनें ,
तुम्हीं से तो नही....?
तुम्हारा हर शब्द,
मन के धागे से,
चिपक जाता है,
 और बढ़ा देता है....
मेरी उलझन...
मन की डोर का ,
एक छोर....
तुम्हारे पास जो है...
                       -संगीता




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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...