कभी वो मेरे
अतीत के
गहन गुफाओं के अँधेरों में
चहलकदमी करता है....
कभी वो उन्हीं
अतीत के चलचित्रों में
खुद को पाता है....
खुशी और गम के आँसुओं को
हंस सा... वह
सुख का सुख
और .....दुःख का दुःख
अलग करता है
अपने ही दिए
अन्तर्घातों को .....
खुद ही सहलाता है
और कभी वो ...
कुशल कवि सा
मेरे शब्दों को
चुराता है.....
मेरे कुछ रिसते घावों पर
वो....
औषधि लेपन भी करता है
और बीच -बीच में
मेरे दर्द से
खुद कराह उठता है
इतनी तकलीफ....
उसे कभी न होती
गर.....
वो जान लेता
सबकुछ
जो ...उसे
मन की आँखों से नजर आता...
खण्डित मनमूर्ति
के लिए ...अब
एक रिक्तता सी
होती है ....
जब भी
वो ...
कुछ कहता है...
-संगीता
अतीत के
गहन गुफाओं के अँधेरों में
चहलकदमी करता है....
कभी वो उन्हीं
अतीत के चलचित्रों में
खुद को पाता है....
खुशी और गम के आँसुओं को
हंस सा... वह
सुख का सुख
और .....दुःख का दुःख
अलग करता है
अपने ही दिए
अन्तर्घातों को .....
खुद ही सहलाता है
और कभी वो ...
कुशल कवि सा
मेरे शब्दों को
चुराता है.....
मेरे कुछ रिसते घावों पर
वो....
औषधि लेपन भी करता है
और बीच -बीच में
मेरे दर्द से
खुद कराह उठता है
इतनी तकलीफ....
उसे कभी न होती
गर.....
वो जान लेता
सबकुछ
जो ...उसे
मन की आँखों से नजर आता...
खण्डित मनमूर्ति
के लिए ...अब
एक रिक्तता सी
होती है ....
जब भी
वो ...
कुछ कहता है...
-संगीता
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