Wednesday, 10 January 2018

सब यहीं है...

जिंदगी को ..
सीधी -साधी दुनिया में
जन्नत बनते देखा है मैंने
मन  न जाने कब ,
बादलों के पार झाँक आता है,
और कभी,
स्वर्णिम आभा के साथ
अटखेलियाँ करता है,
अनियंत्रित सा मन
घूम आता है ,
पूरा जहाँ ,
पल भर में
और ,
भर देता है
पल भर में
खुशियों की झोली
ऐसे मनचाहे जन्नत को
जहन्नुम बनते भी
देखा है,
जब,
मन किसी और की
गुलामी करता है
घुट -घुट कर ,
खुशियों का
गला घोंटता है,
आइने में ,
खुद की
पीली पड़ी ,
काया को ....
अजनबी सा देखता है
खुद के बनाए
ताने -बाने में उलझ कर,
अपने आँसू पोछकर
खुद ही मुस्कुराता है
रोक कर रखता है
जज्बातों का समन्दर
इन सब के साथ भी ,
बड़ी अजीब बात
वो ,
उससे,
 निकलना नही चाहता है ,
उस जहन्नुम के पार की,
हँसी दुनिया,
देखने का जज्बा
किसी -किसी में
होता है....
                   -संगीता



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