Wednesday, 10 January 2018

तुमने नही कहा था ...

दुनिया के रीति -रिवाजों को
दरकिनार कर आई ,
राहों में फैले लोभ मोह 
सब छोड़ -छाड़ कर आई,
निर्झरिणी सी बहकर 
कितनी ठोकर खाई ,
तुम्हारे फीके रागों ,पर भी
  सुरलहरी सी छाई                       
 प्रतिपल तुमसे नेह बढ़ाया
मधुर -मधुर मुस्काई ,
कितने बसन्त थे बीत गए 
जब ,तुमसे मिल पाई,
पुरइन पात पर ,
मोती सी ढलकी 
कितने पास तुम्हारे आई ,
तुमने,
एक क्षण में ही ,
बोल दिया-
"किसने कहा था "
मैं अवाक् सी ,
बस , इतना ही कह पाई ,
पता नही ....
                    -संगीता

No comments:

Post a Comment

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...