दुनिया के रीति -रिवाजों को
दरकिनार कर आई ,
राहों में फैले लोभ मोह
सब छोड़ -छाड़ कर आई,
निर्झरिणी सी बहकर
कितनी ठोकर खाई ,
तुम्हारे फीके रागों ,पर भी
सुरलहरी सी छाई
प्रतिपल तुमसे नेह बढ़ाया
मधुर -मधुर मुस्काई ,
कितने बसन्त थे बीत गए
जब ,तुमसे मिल पाई,
पुरइन पात पर ,
मोती सी ढलकी
कितने पास तुम्हारे आई ,
तुमने,
एक क्षण में ही ,
बोल दिया-
"किसने कहा था "
मैं अवाक् सी ,
बस , इतना ही कह पाई ,
पता नही ....
-संगीता
-संगीता
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