Monday, 8 January 2018

क्या कहूँ...

जैसे,मेरे सर पर
सूरज आ खड़ा है
कि, बौनी होती परछाइयाँ
सिमट गई हैं,
पैरों में.....
गर्म तवे सी,
तपती जमीन
पर,
कोई पौधा ,
अचानक-
 मुस्कुराता नजर आया हो ,जैसे
उसके नन्हे पत्तों की ,
छतरी में, आने को आकुल मन
उलझ कर रह गया,
और, तपने लगा
धरती के साथ ...
फिर ,बौनी परछाइयों ने
अपना रुख बदला
और,
मुझे स्थिर छोड़
बढ़ने लगीं.....

                -संगीता



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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...