राह दर राह मैं बढ़ती रही ,
तुम्हें छोड़ कर
सब पाती रही
तुम्हारे जबाब लिए
कबसे खड़ी रही
पर ,
तुमने पूछा ही नही....
धमनियों में धुँए भर गए हों ,जैसे
तुम्हारे अरमान सुलगने से
तुम्हारी हर आहट
दम घोंटना चाहती है
ऐसा क्यों है ...
तुमने कभी ,जाना ही नही
तुम्हारे गमगीन पलों को ,
तुम्हारे वजूद के ,
हर पहलू को
खुद पर ,आजमाया मैंने
तुम्हारी हर ,समझ को
समझती रही
पर,
तुमने समझा ही नही
दुनिया की भीड़ में
एक, तुम दिखे मुझे
तुम्हें ,सब छोड़ कर
बेपरवाह हो ,
अपने गले लगाती रही
पर, तुमने भी
मुझे समझा ......
तो ....सिर्फ
गले की .....फाँस...
जो तुम्हारे हिसाब से
कभी खुली नही.....
-संगीता
तुम्हें छोड़ कर
सब पाती रही
तुम्हारे जबाब लिए
कबसे खड़ी रही
पर ,
तुमने पूछा ही नही....
धमनियों में धुँए भर गए हों ,जैसे
तुम्हारे अरमान सुलगने से
तुम्हारी हर आहट
दम घोंटना चाहती है
ऐसा क्यों है ...
तुमने कभी ,जाना ही नही
तुम्हारे गमगीन पलों को ,
तुम्हारे वजूद के ,
हर पहलू को
खुद पर ,आजमाया मैंने
तुम्हारी हर ,समझ को
समझती रही
पर,
तुमने समझा ही नही
दुनिया की भीड़ में
एक, तुम दिखे मुझे
तुम्हें ,सब छोड़ कर
बेपरवाह हो ,
अपने गले लगाती रही
पर, तुमने भी
मुझे समझा ......
तो ....सिर्फ
गले की .....फाँस...
जो तुम्हारे हिसाब से
कभी खुली नही.....
-संगीता
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