Monday, 8 January 2018

गुनगुनाओ...

चेतना का राग
तुमने सुना है क्या ..
अपने अन्तर्मन की
गम्भीर भंगिमाओं में
कोई खींचता है तुम्हें,
अनुभव किया क्या-
 उसकी  उपस्थिति का ....
वो कोई और था ,
जो,
तुम्हें भरमाता था ,
तुम उस तक नही पहुँचे,
जो,
तुम्हें राह  दिखाता था ,
तुम्हारे अधरों पर ...
जो ,
साक्षात् रहता था ,
तुमने उसका ,
कोई गीत न सुना
सृजन के साथ ,
उसका है नाता
उसकी डोर ....
अनन्त की ओर हैं जाती,
उस ओर ...
कोई और नही ...
तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब है
तुम्हारी चेतना
जिसे गाती है ,
गुनगुनाती है....
              -संगीता

No comments:

Post a Comment

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...