जब भी मैं तुम्हें
आवाज लगाती हूँ
मेरी आवाज
तुम्हारे कानों को
छू कर निकल जाती है
और तुम,
अपने में ही रमे हुए
मेरी हर आवाज को
बिना सुने निकल जाने देते हो
उसे रोककर
कभी सुनने की
कोशिश भी नही करते
मेरे हर शब्द में
तुम थे ,
मेरे दिल से निकली आवाज
सिर्फ तुम तक जाना चाहती थी
पर ..तुमने
उन स्वरों को
अनन्त में भटकने के लिए
छोड़ दिया ...
मेरी हर ध्वनि ,
प्रतिध्वनि के रूप में
न जाने ...
तुम तक कब पहुँचेगी
तुम इंतजार कर सकोगे ....?
सदियों तक ...
उन स्वरों को
सुनने के लिए
काश तुम सुन लेते ...
मेरा हर स्वर
छूटने से पहले .....
संगीता
आवाज लगाती हूँ
मेरी आवाज
तुम्हारे कानों को
छू कर निकल जाती है
और तुम,
अपने में ही रमे हुए
मेरी हर आवाज को
बिना सुने निकल जाने देते हो
उसे रोककर
कभी सुनने की
कोशिश भी नही करते
मेरे हर शब्द में
तुम थे ,
मेरे दिल से निकली आवाज
सिर्फ तुम तक जाना चाहती थी
पर ..तुमने
उन स्वरों को
अनन्त में भटकने के लिए
छोड़ दिया ...
मेरी हर ध्वनि ,
प्रतिध्वनि के रूप में
न जाने ...
तुम तक कब पहुँचेगी
तुम इंतजार कर सकोगे ....?
सदियों तक ...
उन स्वरों को
सुनने के लिए
काश तुम सुन लेते ...
मेरा हर स्वर
छूटने से पहले .....
संगीता
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