Saturday, 20 January 2018

कुछ विचार यूँ ही कौंध जाते हैं।

दर्पण के सामने खड़ी मैं .....न जाने किस दुनिया में चली जाती हूँ ....और  जाने क्या मन में आता रहता है,जो गलत भी नही होता है...... दर्पण के पीछे न जाने कितने राज छिपे होते हैं दर्प को दिखाता दर्पण सामने से जितना  दिखाता है उससे कहीं अधिक वह देखता है।उसके समक्ष हम बाहर -भीतर से खुल जाते हैं हमारे हर रूप का प्रथम द्रष्टा दर्पण ही होता है, जो ,वो सब कुछ देख लेता है जिसे हम दुनिया भर से छिपाते फिरते हैं।हमारी अनगिनत  खुशियों के पल उसमे कैद होते हैं, तो अनगिनत आँसू भी वही छुपा कर रखता है। हम अपना जीवन जीते हैं और दर्पण के सामने जाते ही दर्पण हमारा जीवन जीने लगता है .......जितनी भी देर हम उसके सामने रहें,वह हमसे सब उगलवा ही लेता है ...हम भले किसी को न बताना चाहे वह हमारी आँखों में गहरे उतर कर मूंगे मोती शंख उठा लाता है...... पर परम विश्वासी सा वह किसी से कुछ नही कहता है।असंख्य रहस्यों के साथ हर किसी का होकर रहता है।
                                                                                            -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...