Sunday, 14 January 2018

'काश दिख जाता सबकुछ '

शरीर पर इतने गहरे घावों को
तुम देखते नही,
कैसे  दिखाऊँ ...वो घातें
जो ,मन पर लगी हैं
इतने गहरे जख्मों पर ,
फिर जख्म बढ़ा देते हो
मन तक तो ,
तुम... कभी पहुँचते नही ,
सोंचती हूँ ,
मन को स्वर मिल जाता ,
तो.....
उसकी आवाज कैसी होती
जो कुछ ,मेरा मन जानता है
मेरा मन झेलता है,
वो ....सारी बातें ...
वो ,
खुद कह पाता ,
काश ऐसा होता .....
तो,तुम सुन पाते
उसकी चीख,
उसकी दमघुटी आवाज़,
उसके भीतर जमे
वो,
अवसादों के पहाड़,
मन के आईने पर ,
परत पर परत चढ़ती धूल ,
तुम ,सब जान जाते ,
कि, मेरा मन
कितनी बार मर कर....
जी उठता है,
एक बार फिर मरने को ..
तैयार...है ,वो
एक बार फिर ,
तुम उसकी हत्या करोगे...
जिसके लिए ...,
संसार भर में ...
किसी 'दण्ड 'का विधान नही है
तुम हर बार ...
बाइज्जत बरी ,
और मैं...
हर बार ....
सजा की हकदार...
मेरे मन को ...
काश..... तुम छू लेते
अपने मन से....
                      -संगीता
     






No comments:

Post a Comment

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...