Monday, 19 March 2018

आज....

हृदयतल  नम है...
आँखों के साथ,
जो सुना
 वो नया न था,
शाश्वत है जीवन -मरण
सांसरूपी ज्योति
बुझ जाती है बिन हवा तूफान के ,
आज बुझी थी वो ज्योति
एक नन्ही सी परी की 
एक माँ से दूर हुआ था,
 उसके आँचल का सुख....
उस नन्ही परी ने कहा था माँ से
बिन बोले ....
आऊँगी  'माँ' तुम्हें फिर हँसाने,
थाम लेना मुझे,
स्नेहिल बाहों में ....
तुम्हारा अपरिमित वात्सल्य
रहेगा मेरे लिए,
पर, तबतक
न होना उदास...
यही तो है जगत की रीत 
जिसपर हमें चलना है...
                           -संगीता







उथल-पुथल सी 

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...