Tuesday, 20 March 2018

बचपन ....उम्र भर नही ...

गुब्बारों से खेलने की उम्र में
वो, गुब्बारे बेंचता है,
गली,चौराहे ही नहीं
हर ओर से गुजरती नजर से
वो, गुज़ारिश करता है,
खरीद ले कोई
दो -चार न सही
एक ही ,
मिल जाएंगे बहुत न सही
कुछ तो .....
भर पाऊंगा आधी फीस
ले पाऊंगा... बहन की पेंसिल
यही सोचकर..
उसने फिर आवाज़ लगाई....
ले लो...ले लो
पाँच की एक...
बीस की पाँच...
                 -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...