इंच- इंच बढ़ती और सिमटती मुस्कान
एकसाथ....
आँखों की भीगी पुतलियाँ
जानती नही आँसू क्या है...
वो तो भीग जाती हैं
वक़्त- बेवक़्त,
रोता तो दिल है
जो दिखाता नही ....
खारे पानी के सोते
कैद हैं भीतर
जो ढलक आते हैं
हल्की सी चोट पर
वो, हल्की सी चोट
जो, तोड़ देती है
चट्टान को...
संगीता
एकसाथ....
आँखों की भीगी पुतलियाँ
जानती नही आँसू क्या है...
वो तो भीग जाती हैं
वक़्त- बेवक़्त,
रोता तो दिल है
जो दिखाता नही ....
खारे पानी के सोते
कैद हैं भीतर
जो ढलक आते हैं
हल्की सी चोट पर
वो, हल्की सी चोट
जो, तोड़ देती है
चट्टान को...
संगीता
Good
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