Thursday, 22 March 2018

जो देखा वो था नही....

पर्वतों की नीलिमा को ढकती सफेदी के बीच
तंग बर्फीले राहों  से होकर
हैरत भरे स्वप्न की मनोरम छटा
मन को रोक लेना चाहती है
पर, मैं भागती हूँ....
जाने कहाँ पहुँचने की चाह लिए,
गति बढ़ जाती है हृदय की 
 कदम जब ठहरते हैं
कोई नही उस हिमगिरि के शिखरों पर
सिर्फ मैं...
मैं रोती हूँ बेतहाशा
नजर में नही मैं किसी के 
आँसू गिर रहे हैं 
मैं उठ रही हूँ.....?
                   -संगीता





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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...