सब कुछ थाम कर चलने वाला
जब कह दे.…..
मैं थक गया हूँ,
तुम्हें ढोते-ढोते....
पतझड़ में झड़ते पत्तों सा वो,
बिखर पड़े जो राहों में
उस पल...वो
फूटते कोंपलों के बीच
देख नही पाता ...
जीवन की लाली,
भारहीन सा वो....
जिसे सम्भाले फिरती हूँ
उसके लिए मैं ...
गुरु गम्भीर हूँ,
गीले रुई के फाहे के
सूखने का इंतजार ....
या ,
सूखी टहनियों पर
हरे पत्तों के आने की चाह....
-संगीता
जब कह दे.…..
मैं थक गया हूँ,
तुम्हें ढोते-ढोते....
पतझड़ में झड़ते पत्तों सा वो,
बिखर पड़े जो राहों में
उस पल...वो
फूटते कोंपलों के बीच
देख नही पाता ...
जीवन की लाली,
भारहीन सा वो....
जिसे सम्भाले फिरती हूँ
उसके लिए मैं ...
गुरु गम्भीर हूँ,
गीले रुई के फाहे के
सूखने का इंतजार ....
या ,
सूखी टहनियों पर
हरे पत्तों के आने की चाह....
-संगीता
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