Saturday, 17 March 2018

जब कोई छूटता है ....

सब कुछ थाम कर चलने वाला
जब कह दे.…..
मैं थक गया हूँ,
तुम्हें ढोते-ढोते....
पतझड़ में झड़ते पत्तों सा वो,
बिखर पड़े जो राहों में
उस पल...वो
फूटते कोंपलों के बीच
देख नही पाता ...
जीवन की लाली,
भारहीन सा वो....
जिसे सम्भाले फिरती हूँ
उसके लिए मैं ...
गुरु गम्भीर हूँ,
गीले रुई के फाहे के
सूखने का इंतजार ....
या ,
सूखी टहनियों पर
हरे पत्तों के आने की चाह....
                                 -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...