Wednesday, 23 May 2018

परिभाषा ...

रेतीली पथरीली राहें
नागफनी सी चुभती राहें
जिनपर चलती मेरी काया
लौट मुझी तक आती राहें....
प्रश्नों के अंबार भरे हैं
काली गहन गुफाओं में
उजले -उजले हंसों जैसे
होना चाहें मेरी राहें...
ठहर किसी अनुभव की शिला पर
करती हैं विश्राम ये राहें
अनगिनत जीवन दृश्यों से
परिभाषाएं गढ़ती राहें......
एक दूजे के साथ पड़ी हैं
जैसे तेज फिसलती राहें
अपना हाथ छुड़ा मत लेना
जहाँ नजर नही आती राहें....
                          -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...