Thursday, 24 May 2018

अनगिनत सपने...

सपनों की चादर
पाँव से लम्बी थी ....
जमी थी जिसपर
बरसों की धूल,
दाग- धब्बे परिस्थितियों के
बढ़ते ही गए
पूरी नींद के अधूरे सपने ,
जगती आंखों के सोए सपने ,
व्यंग्यबाणों से कराहते सपने ,
पूरे होने को तड़पते सपने ,
अपनी आवाज़ घोटते सपने,
फिर भी ,
बेबुनियाद  नही मेरे सपने....
                              -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...