रात भर चाँदनी के बीच वो
बिखरा रहा,
घिर कर काली घटाओं में
मनभर वो
बरसता रहा ,
प्यासी धरती को भी
बूँद -बूँद से भरता रहा ,
कह रहा वो आज मुझसे
प्रेमपथ में हूँ खड़ा ....
बाँध लो अलकों में तुम
या छोड़ दो उस राह में
तुम्हारे लिए जिस राह मैं बढ़ता रहा....
हूँ कालिदास की उपमा सा मैं बिखरा पड़ा
संसार भी इस मेघ से मुख मोड़ता ही रहा....
-संगीता
बिखरा रहा,
घिर कर काली घटाओं में
मनभर वो
बरसता रहा ,
प्यासी धरती को भी
बूँद -बूँद से भरता रहा ,
कह रहा वो आज मुझसे
प्रेमपथ में हूँ खड़ा ....
बाँध लो अलकों में तुम
या छोड़ दो उस राह में
तुम्हारे लिए जिस राह मैं बढ़ता रहा....
हूँ कालिदास की उपमा सा मैं बिखरा पड़ा
संसार भी इस मेघ से मुख मोड़ता ही रहा....
-संगीता
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