Sunday, 30 September 2018

जो है वो बेइन्तहां...

आँखों में उतर जाती है
कभी खुमारी
कभी तैरते हैं जल -कण.....
खिलती हैं कलियाँ
गालों पर,
कभी गुलाबी गालों पर
उँगलियाँ नजर आती हैं,
खुले दरवाजे  पर
घुटती सासें....
रुक नहीं सकतीं
किसी के आने -जाने पर ....
मन में चलते चक्रवातों के बीच
जज्बातों की रेशमी धज्जियाँ,
उड़ -उड़ कर सिमट आती हैं.....
प्रेम के नाम पर
हो गए हैं रिश्ते किसी झरने के धुन से,
हैं ...पर दिखते नहीं हैं.....
जल ही जल होता है झरने के पास भी
कोई कंकण भी मारे तो ,
तरंगें उठती नहीं हैं....
प्रेम -घृणा का मिश्रण यह
कुछ भी कहो
जो है, बेइन्तहां है......
                     -संगीता





1 comment:

  1. बहुत ही सुंदर कविता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...