जज्बातों के समंदर में
गोते खाता दिल
भँवरों में घूमते हुए भी
तुमसे जाता मिल
अलसाए सब बाग -वन
तुम बिन बैरन दिन-रात
करते हैं कोलाहल पंछी
खुशियों की नही सौगात
बिखरी हुई अनगिनत उलझन
तुम बिन कैसे सुलझाऊँ
दिल को तो समझा सकती हूँ
तुमको कैसे समझाऊँ
-संगीता
गोते खाता दिल
भँवरों में घूमते हुए भी
तुमसे जाता मिल
अलसाए सब बाग -वन
तुम बिन बैरन दिन-रात
करते हैं कोलाहल पंछी
खुशियों की नही सौगात
बिखरी हुई अनगिनत उलझन
तुम बिन कैसे सुलझाऊँ
दिल को तो समझा सकती हूँ
तुमको कैसे समझाऊँ
-संगीता
Atisundr
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